Wednesday, November 18, 2009

ज़ख्म

सुना है वक्त हर ज़ख्म का मरहम होता है
कोई ये क्यों नही बताता ज़ख्म क्यों मगर होता है

सितमगर तो हर ज़ख्म मुसलसल करते जाता है
क्या बात है जो सितम मगर हमसे नही होता है

सफर आग के अंगारों पर बेपरवाह
ये कौन सिरफिरा करता फिरता है

आज ज़िक्र छिड़ा फ़िर उस रोज़ की वेह्शत का
सिलसिला हैवानियत का चला तो फ़िर कहा थमता है

Sunday, November 15, 2009

क्या से क्या हो गया!

इज्ज़त बक्षी तमाम उसको
ख़ुद बेईज्ज़त हो गया

लज्जा का सबक पढ़ना चाहा
ख़ुद ही लज्जित हो गया

बात करी जब ईमान की
अपना सा मुँह लेकर रह गया

दिल पे बोझ लिए फिरता हूँ
समझ सके जो उसे ढूंढता ही रह गया

बड़ी उम्मीदे थी ख़ुद से
ता उम्र उन्हें ढोता ही रह गया

अजीब कशमकश में काटी है ज़िन्दगी
रब से यही गिला रह गया

चलते चलते थक सा गया हूँ
एक ठंडी छाव को तरसता रह गया

सोचता था मौत धो देगी गुनाह ज़िन्दगी के
मौत के मरहम से भी महरूम रह गया

क्या क्या संगे खिश्त खा कर भी
लहू के एक कतरे को तरस गया

के धो लूँ गुनाह तमाम अपने
ये आरजू लिए लिए ही निकल गया

अजीब पहेली है ज़िन्दगी भी यारब
इक शब्द के लिए ये सुखनवर भी तरस गया



कल का पाठ

कल के जो बच्चे होंगे
वो किनके जैसे होंगे ?

जब खाने में होगी मिलावट
तो कैसी सेहत पाएंगे ?

जब सोच में होगी मिलावट
तो क्या शक्सियत पाएंगे ?

दौडेंगे भागेंगे पछतायेंगे
तबीयत मसोस के रह जाएँगे

माँबाप सिखायेंगे दुनिया का चलन
एक दूसरे की खाल नोचते जाएँगे

मुँह पर कुच्छ और मन में कुच्छ और
भावनाओ से खेलना बखूबी सीख जाएँगे

हाँ कुच्छ अच्छे इंसान भी बनेंगे
मगर इंसानियत की वेह्शत कहा तक झेल पाएंगे ?

सभी कहते है सौरभ इतना बुरा क्यों बोलते हो
ख़ुद बुरा न कर पाए बस औरों को उपदेश पढायेंगे ?

जद्दोजहद

कितनी मुसीबतों को गले लगाया
फिर भी मैंने क्या पाया ?

क्यों लड़ता रहा हालत से मैं
आख़िर कौन मेरे साथ आया ?

जूझो अपने हालात से सिखाती है दुनिया
फरेब करो हर उस शक्स से जो तुम्हारे काम आया

दौड़ रहे है सभी आगे बढ़ने के वास्ते
अपाहिजों पे तरस किसी को भी न आया

क्यूकर करू मैं रहम तुम पर
बड़ी मुशकिल से ऊँट पहाड़ के नीचे आया

नाम न लो देस परदेस का मुझसे
दोनों जगह एक ही सा तमाशा पाया

किस बात का गुरूर किया करते हो
ऐसा क्या है जो तुमने ख़ुद में पाया?

माना तुम भी हालत के हो मारे
फिर वो कौन था जो कल मेरे ज़हन में आया?

हाँ उसे रहम नही आता
उसे तो मैंने अपने से ज़्यादा मजबूर पाया

नाम ले ले के जिसका लड़ते रहे लगातार
वो शक्स बेकार मेरी ज़िन्दगी में आया

बे इन्तेहाँ मोहब्बत की जिससे
उसे मैंने अपनी बाहों में दम तोड़ते पाया

पुछा खुदा से क्या इन्साफ है तेरा
जवाब में ज़माने भर का सन्नाटा पाया

ज़िन्दगी दी है जीने के वास्ते
ज़िन्दगी में फरेब के सिवा कुच्छ भी न पाया

खुदगर्ज़ ज़माना क्या सिखायेगा मुझको
चराग ले कर ढूँढा एक सच्चा इंसान न पाया

कहते है इश्वर के नियम को समझाना है नामुमकिन
क्या है क्यों है ये कोई नही समझ पाया

मुझे माफ़ कर देना चलता हूँ अब
यही समझूंगा मिटटी का क़र्ज़ नही चुका पाया


मै भी सबके जैसा हूँ


कितनी हसरतें पाले बैठा हूँ
आह! क्या मै भी सबके जैसा हूँ?

मोहब्बत है मुझे भी ख़ुद से शायद
बोझ ज़िन्दगी का तभी ढोता हूँ

जानता हूँ जबकी मौत ही है आखरी निजात
फिर क्यों नित नए सूरज तलाशता हूँ?

तुमको देखता हूँ ऐसे
जैसे मैं तुम्हारा आईना हूँ

मेरी तकलीफें क्या समझोगे तुम
बतलाऊ क्या ख़ुद सोच में पड़ जाता हूँ

खौफज़दा हूँ यादों के मंज़र से
कब से न जाने मैं मरता रहा हूँ

सुना है रहनुमा है खुदा अपने बन्दों का
बन्दा कौन, खुदा कौन, बस इसी कशमकश में हूँ

दस्तक दे रहा है आज फिर कोई दिल की गहराइयों से
चलो अन्दर कौन है चल के देखता हूँ

सदियों से बैठा रहा है जो बुत बनकर सदा
कारोबार उसी का है ये सब, क्या मैं नही जानता हूँ?

वो ही मैं है, मैं ही वो हूँ, दरमियाँ भी हैं हमीं दोनों
आलावा इसके और मैं कुच्छ नही जानता हूँ






Kaun Hai Wo Jo...

kaun hai wo jo rehta hai sada dil ki gehraiyo mein
swayam-prakashit hai jo andheron aur ujalon mein

soch ki soch hai jo khayalo ka khayal hai
swapnon ka swapn hai jo vishayon ka aadhar hai

hone bhar se jiske hota hai sabka bharan-poshan
charachar srishti hai jiska anant aangan

jab faasla usse hai tinke bhar ka bhi nahi
ojhal hai kyu phir wo, nazar aata kyu nahi?

khatam hoga silsila in saanso ka jis pal
samajh jau ye paheli mai shayad usi pal

Friday, November 13, 2009

kya kahoon?

aksar sochta hoon ki kuch kahoon
phir sochta hoon, kya kahoon?

sun sun k batein logon ki
thaga sa reh jata hai, kya kahoon?

ehsaas ke bawandaron mein aksar
bikhar ke reh jata hoon, kya kahoon?

chalo rehne do bas bahut hua
kisse kya sunoo, kisse kya kahoon?